जब किसी सरकारी दफ़्तर में अपनी फाइल आगे बढ़ाने के लिए आप घंटों खड़े रहते हैं और बाबू टेबल के नीचे से कुछ माल-पानी लिए बगैर फ़ाइल आगे नहीं खिसकाता, जब बैंक में आप कोई चेक जमा करने, ड्राफ्ट बनवाने या और भी दूसरे कामों से जाते हैं और बैंक का कोई कर्मचारी घड़ी की सुईयों की तरफ़ देखकर लंच पर जाने का इशारा करके निकल लेता है और आप मुंह ताकते रह जाते हैं, पर क्या आप कभी सोच सकते हैं कि देश की सीमाओं पर चौबीसों घंटे निगरानी करने वाला एक जवान अग़र हमले के समय ये सोचे कि – “जब तक मेरे बाक़ी साथी संभालेंगे, मैं ज़रा खाना खा लेता हूँ या सुस्ता लेता हूँ, ” या फ़िर वो ये सोचने लगे कि चलो दुश्मन को देश की सीमाओं के भीतर आने देते हैं । न वो मरें, न हम मरें, हम भी आराम करें और उन्हें भी करने दें तो क्या भला हम उन्हें माफ़ करेंगे ? या हमसे पहले सेना प्रशासन उन्हें वापस आने भी देगा। इन सवालों के जवाब सोचेंगे तो फ़ौज की भाषा में आपका ‘नॉर्थ गुम’ जायेगा यानि कि आप दिशाहीन हो जायेंगे जबकि इन फ़ौजियों के लिए फ्रन्ट रोल, बैक रोल, फ्रॉग-जम्प, बंदूक-परिक्रमा जैसी सज़ायें तो इनका रोज़ का नाश्ता हैं।

पिछले दिनों सियाचीन में एवलांछ के गिरने से भारत के नौ जवान मौक़े पर ही शहीद हो गये और उनके बीच छः दिन तक बर्फ़ के भीतर दब कर भी जीवित रह जाने वाले धारवाड़, कर्नाटक के लांस नायक हनुमंथप्पा जब देश की तमाम दुआओं और प्रार्थनाओं के बावजूद भी अपने भौतिक शरीर में स्थान न बना सके और देश को अलविदा कह गये तभी अचानक हम सब की फेसबुक प्रोफाईलों पर देश-भक्ति उमड़ आई ।

ऐसे में कुछ लोग ये भी कह रहे थे कि लांसनायक हनुमनथप्पा तो भाग्यशाली रहे कि उन्हें पूरा देश जान सका पर उन बाक़ी नौ लोगों का क्या जो मौक़े पर ही शहीद हो गये या फिर उन दस हज़ार जवानों का क्या जो वहां हमेशा तैनात रहते हैं ? कुछ ये भी कह रहे थे कि ये तो उनकी नौकरी है, उन्हें इसके लिए पैसे मिलते तो हैं लेकिन क्या आपने या हमने ये सोचा है कि पैसे तो हमें भी अपनी नौकरी के लिए मिलते हैं। अपना काम करने के लिए मिलते हैं लेकिन क्या हम अपनी नौकरी को उस शिद्दत से निभाते हैं जैसे कि ये फ़ौजी ? अग़र जानबूझ कर कोई अपने परिवार से दूर जाता है और जोख़िम भरी ज़िन्दगी का चुनाव करता है तो वो होते हैं ये फ़ौजी।

बिहार, पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों के ग्रामीण इलाकों में घर का सबसे बिगड़ैल और क्रोधी स्वभाव का लड़का जो परिवार वालों के लिए परेशानी का सबब बनता है, वही बिगड़ैल लड़का फ़ौज के नियम, कानून और अनुशासन में रहकर अपनी ऊर्जा को देश के लिए समर्पित करके एक ज़िम्मेदार नागरिक में तब्दील हो जाता है और वो कर गुज़रता है जो शायद एक आम नागरिक ना कर सके। फ़ौज का ढाँचा, वहां का माहौल होता ही कुछ ऐसा है जो आपको आम दिनों में भी उत्साहित रखता है । यकीं न हो तो अपनी आंखें बन्द कीजिये और दो मिनट के लिए देशभक्ति शब्द के बारे में सोचिये, आपकी आंखों के सामने क्या आता है ? उम्मीद है ‘तिरंगा’ तो सभी को नज़र आयेगा। किसी को क्रिकेट ग्राउंड भी नज़र आ सकता है। किसी को सेना और फ़ौज तो किसी को किसी देशभक्ति फ़िल्म का गीत-संगीत और दृश्य लेकिन जो सबको दिखेगा वो है ‘तिरंगा’। जो तीन रंगों का एक कपड़े का टुकड़ा भर नहीं है, ये वो कड़ी है जो हमें एक-दूसरे से जोड़ती है और इस बात का एहसास कराती है कि हम चाहे जिस भी धर्म, जाति, क्षेत्र या सम्प्रदाय से सम्बन्ध रखते हों पर विश्व-पटल पर हमारी पहचान इस झंडे से ही है ।

राष्ट्रीय पर्व जैसे स्वतंत्रता दिवस, गणतन्त्र दिवस, गाँधी जयन्ती अथवा देशभक्ति दिखाने के कुछ ख़ास मौक़ों को छोड़कर (जैसे हाल ही में लांसनायक हनुमंथप्पा और उससे पूर्व पठानकोट आतंकी हमले में भारतीय जवानों की शहादत के समय) अपनी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में हम कब देश के प्रति सजग होते हैं । हम कब ये सोचते हैं कि फेसबुक और व्हाट्सअप पर तस्वीरें बदलने और स्टेट्स लिखने के अलावा भी देश के प्रति हमारा कुछ कर्तव्य है। हममें से कितने लोग सेना में अपना करियर बनाने के बारे में सोच पाते हैं या फिर अपने आस-पास के लोगों को सेना में जाने के लिए उत्साहित कर पाते हैं। 2016 की ही बात करें तो भारतीय सेना में 3221 से भी अधिक पदों पर भर्तियाँ निकली हैं पर इन नौकरियों में कोई जायेगा क्यूँ ? ऐसा क्या आकर्षण होगा कि कोई अपनी जान हथेली पर रखकर इस विकल्प को चुनता है; तो हुज़ूर उसी आकर्षण को देशभक्ति कहते हैं।

यहाँ आम माँ-बाप अपने बच्चों को एनसीसी तक में भेजने से सिर्फ़ इसलिए कतराते हैं कि उनके बच्चे की पढ़ाई में बाधा पड़ेगी । वो बोर्ड परीक्षाओं में टॉप कैसे करेंगे वगैरह-वगैरह। जबकि एनसीसी एक ऐसा महत्वपूर्ण संगठन है जो देश में अनुशासित और उत्साहित युवा तैयार करता है। देश के युवाओं को सेना में करियर बनाने से जुड़ी सभी मूलभूत जानकारियाँ देता है लेकिन यदि बीते वर्ष के आंकड़ों पर नज़र डाली जाये तो रक्षा मामलों की स्थायी संसदीय समिति द्वारा जारी रिपोर्ट में एनसीसी कैडेट्स की संख्या घटी है । मई 2015 में के दौरान जारी इस रिपोर्ट में बताया गया था कि तत्कालीन वर्ष के लिए कैडेटों की भर्ती की प्रस्तावित संख्या 15 लाख थी जबकि प्रवेश लेने वाले कैडेटों की संख्या लगभग 11 लाख 73 हज़ार के क़रीब ही रही । समिति ने यह भी इच्छा ज़ाहिर की थी कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय की सहायता से एनसीसी को शैक्षणिक गतिविधि का ज़रूरी हिस्सा बनाया जाये जिससे देश में उत्साहित, अनुशासित, निस्वार्थ भाव से योगदान देने वाले प्रशिक्षित युवाओं को तैयार किया जा सके और सही भी है भगवा, काली, सफ़ेद, हरी, नीली और तरह-तरह की राजनैतिक पाठशालाओं का हिस्सा बनकर देश के भीतर के माहौल को ख़राब करने से बेहतर है देशभक्ति की पाठशाला का हिस्सा बनकर एक बेहतर युवा शक्ति का निर्माण किया जाये ।

देश के सिस्टम को कोसने के बजाय, शिक़ायतें करने के बजाय समाधानों की ओर रूख़ किया जाये। यदि सेना न सही पर क्यूँ न सेना की इस पाठशाला (एनसीसी) का हिस्सा अधिक से अधिक युवाओं को बनाया जाये, तो इन्तज़ार किस बात का है, निकल पड़िये ढूँढने अनुशासन, रोमांच और उत्साह की इस पाठशाला में अपनी जगह और तय कर लीजिये कि विश्व की तीसरी बड़ी थल सेना का हिस्सा बनना है या देश की हवाओं की सुरक्षा करनी है या फ़िर दुश्मन को पानी के रास्ते देश में घुसने से रोकना है और यदि इनमें से कुछ भी कर पाने का सामर्थ्य या परिस्थितियाँ न जुटा सकें तो एक अनुशासित युवा स्त्रोत बनकर तो ज़रूर उभरिये। यही प्रयास हमारे देश के जांबाज़ों के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि और हमारी देशभक्ति का यथार्थ परिचायक होगा।

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