मुझे कई बातों पर घोर आश्चर्य है कि हरियाणा का समाज जा किस दिशा में रहा है? आजतक हम दूसरों का दोष निकालते रहे लेकिन हमनें अपनी कमियों की तरफ कभी ध्यान नही दिया. युद्ध में आप विरोधी की शक्ति का बखान करते रहो और ये कहते रहो कि उसने ये कर दिया? तो आपने क्या किया?अपनी कमियों पर ध्यान देना स्वयं को सुदृढता की ओर ले जाना होता है लेकिन अपनी कमियों की बात करना कौम से गद्दारी कहा जाता है. हमारा समाज कड़वा कहने का व कड़वा सुनने का आदी रहा है और सदा अपनी कमियों पर टिप्पणी करने वाला रहा है.
हरियाणा में हमें इतना नुकसान हुआ और हो रहा है क्या सब नुकसान की जिम्मेदारी किसी और की है? सबसे पहले तो ये भावुक वातावरण का निर्माण किसने किया? कुछ लोग कह रहे हैं कि नान जाट सी एम के बनने से ये हुआ तो भाईयों जब चुनाव में वोट डाल रहे थे तो सबको पता था कि अगर भाजपा की सरकार बनी तो सी एम किसका बनेगा? मेरे अनुसार यह तर्क सही नही है. खैर जब हांसी रेस्ट हाऊस में सरकार के साथ वार्ता फेल हो गई तो हमारे कुछ युवा साथी सांपला आ गए. सवाल ये है कि उनको ये क्यों लगा कि समाज के साथ धोखा हो रहा है? वे क्यों इतने उद्वेलित हुए? ये बात समाज को समझनी होगी. सरकार के स्तर पर भी गलती व जल्दबाजी हुई?
सोशल मीडिया के माध्यम से बहुत विषवमन हुआ है और आज भी हो रहा है. मैं स्वयं भावुक होने वालों में एक रहा. लेकिन अब समय सोचने का है. कुछ लोग पूरे वातावरण को एक विशेष दिशा में ले जाना चाहते हैं और वो दिशा सही नही है. हम जिस संस्कृति व परिवेश व मान्यताओं में रहे हैं उन्हें सबको उतार फेंकने की तैयारी है क्यों? इससे समाज का क्या भला हो सकता है? समाज विभिन्नताओं में एकता का प्रतीक है तो उन सब विभिन्नताओं को तोड़ने का प्रयास क्यों किया जा रहा है. ये दीवाली तो हमने नही मनाई उसके नाना प्रकार के कारण भी रहे. हमारे भाई शहीद हुए और सीमाओं पर अब भी हो रहे हैं लेकिन कुछ लोग दीवाली पर ही प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं? ये क्या है? ये भाई जो ये प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं वे एक तरह से अपने पूर्वजों पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं जिन्होनें इन सब चीजों को मन से स्वीकार किया व पालन किया. इससे क्या फायदा होगा समाज को? हम राजनीतिक रूप से एक होना है या सांस्कृतिक रूप से एक होना है. ये सब किसी विशेष षडयन्त्र की और ईशारा करती हैं जो कुछ लोगों द्वारा रचित है और बहुत हमारे नेता इसको स्पोर्ट करते हैं. ऐसा ना हो हम आसमान से गिरें तो खजूर में अटकें. कुएं से निकले तो खाई में गिर जाएं. हमें सोच समझकर चलना है और षडयन्त्र से बचकर चलना है. हम जब यहां से निकलें तो ढंग से निकलें क्योंकि हो सकता है हम अपनी सारी उर्जा कुएं से निकलने में लगा दें. और खाई में गिर जाएं और उस खाई से निकल ही ना पाएं. लगता यहीं है कि हमें कुएं में गिरे होने का आभास कराने वाले लोग हमें खाई में डालना चाहते हैं और कुएं की गंदगी का बखान बार बार कर रहे हैं हो सकता है खाई में गंदगी कुएं से भी ज्यादा हो. हमें कुएं व खाई दोनों से बचना है और साथ ही बचना है कुएं से निकालने का नाटक करने वालों से जिनका उद्देश्य हमें कुएं से निकालना नही है खाई में डालना है.

बहुत लोग फेसबुक पर बैठकर अपना दिव्य ज्ञान पेलते रहते हैं जो अधिकांशत: किताबी ज्ञान होता है. व्यवहारिक ज्ञान आपको जमींन पर दर दर की ठोकर खाकर ही मिल सकता है. कोई भी किताब किसी भी लेखक का अपना एक निजी दृष्टिकोण होता है और उस लेखक के नजरिए से किसी भी चीज को समझना मूर्खता होगी. हर व्यक्ति का अपना एक देश काल होता है और वह उन्हीं परिस्थितियों में काम करता है. उसकी काम करने की शैली व स्टायल या विचारधारा को किसी दूसरे काल में लागू करना तब तो व्यवहारिक होता है अगर परिस्थितियों में कोई अंतर ना आया हो तो. समय के साथ अंतर आता ही है और उन्हीं सोच व विचारधारा को लागू करना स्वयं व समाज को धोखा देना होता है. अगर आज से बीस साल पहले की किसी बात को आप आज लागू करोगे तो निश्चित रूप से आप विफलता से मुखातिब होगें.
विस्मयकारी है कि चौधरी छोटूराम के समय की विचारधारा आज हूबहू कैसे लागू हो सकती है क्योंकि उस वक्त के हालात व समस्याओं का आकार व प्रकार अलग था और आज अलग है. उस वक्त की डेमोग्राफिक अलग थी और उनमें अलग प्रकार की बात करनी होती थी और आज की अलग है. कुछ लोग चौधरी छोटूराम की पावन पवित्र भावना को दरकिनार करके बस एक ही प्रकार से उन्हें परिभाषित कर रहे हैं. क्यों? कारण क्या है? सतत परिवर्तन सृष्टि का नियम है और आगे बढने के लिए आवश्यक भी है.अगर आपका उद्देश्य समाज को आगे बढाना है तो आवश्यक परिवर्तन के साथ चौधरी छोटूराम की विचारधारा को लागू करो क्योंकि ये आवश्यक है और अगर आपका उद्देश्य समाज को आगे बढाना ना होकर कोई और है तो निश्चित रूप से आज से सत्तर अस्सी साल पहले के समय व काल का अनुशरण करो. मुझे तो ये लगता है कि बीमारी के प्रकार के हिसाब से ही तो चिकित्सक दवाई का निर्धारण करता है और यहीं मरीज के हित में है लेकिन अगर चिकित्सक मरीज का हित ना देखकर अपना हित देखे तो उसे दवाई एक ही रखनी चाहिए और बीमारी के प्रकार का ध्यान नही करना चाहिए क्योंकि उसे तो अपनी दवाई बेचने से मतलब है मरीज ठीक हो या ना हो उसकी बला से!

आवश्यकता इस बात की है कि हम भूत एवं वर्तमान का समान समायोजन करें और ऐसी विचारधारा को वर्तमान में लागू करें जो न केवल भूत की सभी सही शिक्षाओं के अनुकूल हो; उसमें वर्तमान की स्थिति और उसके अनुरूप हल भी विद्यमान हो. हरियाणा के अंदर सोशल मीडिया पर फ़ैल रही विचार धारा आवश्यक नहीं कि पूर्णतया सही ही हो; अतः स्वयम के विवेक का इस्तेमाल कर निर्णय करें.

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