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The Rebel's Diary

Diary of The Rebel

Read in the Court on 6th June, 1929, by Mr. Asaf Ali on behalf of Bhagat Singh and B.K. Dutt
इस महत्वपूर्ण राजनीतिक मसले पर यह लेख जुलाई, 1928 में ‘किरती’ में छपा था। उन दिनों अनेक नेता विद्यार्थियों को राजनीति में हिस्सा न लेने की सलाहें देते थे, जिनके जवाब में यह लेख बहुत महत्वपूर्ण है। यह लेख सम्पादकीय विचारों में छपा था, और सम्भवतः भगतसिंह का लिखा हुआ है।
This is part two of the Jail Notebook of Shaheed Bhagat Singh. This contains excerpts from page 34 till last page.
भगत सिंह का पत्र सुखदेव के नाम; यह पत्र भगत सिंह ने 1929 में लिखा था. इस पत्र को लाहौर कांस्पीरेसी केस में गवाही के दौरान प्रस्तुत किया गया था.
माई लॉर्ड, हम न वकील हैं, न अंग्रेजी विशेषज्ञ और न हमारे पास डिगरियां हैं। इसलिए हमसे शानदार भाषणों की आशा न की जाए। हमारी प्रार्थना है कि हमारे बयान की भाषा संबंधी त्रुटियों पर ध्यान न देते हुए, उसके वास्तवकि अर्थ को समझने का प्रयत्न किया जाए। दूसरे तमाम मुद्दों को अपने वकीलों पर छोड़ते हुए मैं स्वयं एक मुद्दे पर अपने विचार प्रकट करूंगा। यह मुद्दा इस मुकदमे में बहुत महत्वपूर्ण है। मुद्दा यह है कि हमारी नीयत क्या थी और हम किस हद तक अपराधी हैं।
“बहरों को सुनाने के लिए बहुत ऊँची आवाज की आवश्यकता होती है,” प्रसिद्ध फ्रांसीसी अराजकतावादी शहीद वैलियाँ के यह अमर शब्द हमारे काम के औचित्य के साक्षी हैं।
The Rebel Indian is producing authentic text of the note book of Shaheed Bhagat Singh. These diaries and notes are treasure to read and something to memorize for the life to come. This post consists of page 1 to 33 of the notebook.
India witnessed tremendous attacks on Pathankot Airbase recently. These attacks were not only pre-planned but the role of local Police Authorities is also doubtful as senior officials are stated to be careless in handling the situation. Amongst this brutal attack what doesn't come to the headlines is the Facebook Hypocrisy.
भारत का संविधान हमें स्वतंत्रता का मूल अधिकार देता है। संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुसार, “किसी व्यक्ति को उसके प्राण अथवा दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं।“ इस मूल...
Why I am an athiest is an article by Sardar Bhagat Singh which was translated from original Grumukhi version to different versions lateron. It was written on October 5-6, 1930 It is a matter of debate whether my lack of...

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